आयुर्वेद का अर्थ औषधि - विज्ञान नही है वरन आयुर्विज्ञान अर्थात '' जीवन-का-विज्ञान'' है

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Tuesday 8 May 2012

ये आम "ख़ास" है "आम" नहीं

 बंधुओ ये आम का मौसम है .आम तो आम सी ही चीज है पर कभी कभी ये जीवन दायी भी साबित हो जाता है .कुछ रोग ऐसे हैं जिनमे कोई दवा ही काम नहीं करती ,वहाँ ये आम रोगी के लिए ख़ास का दर्जा रखता है आम का नहीं .इस आम का वैज्ञानिक नाम है- Magnifera indica

इस आम के सारे अंग ही प्रयोग में लिए जा सकते हैं आम की मौर,  पत्ते ,छाल, फूल, बीज, गुठली, गोंद , जड़, पका फल, कच्चा फल, सभी का आयुर्वेदिक प्रयोग है . देखा आपने ये आम  है कितने काम की चीज 
इस आम में मंजीफैरिंन , प्रोटीन, आयरन, कार्बोंहाइड्रेट , फैट, अमीनोएसिड , कैल्शियम, फास्पोरस, केरोटीन, ग्लूकोज, सुक्रोज, फ्रक्टोज, गैलोटेनिन, गेलिक एसिड, इथाइल गैलेट, आइसोकवेरसेटिन, बीटा-सिटोस्तीराल , विटामिन सी और ए , रिबोफ्लेविन, डीटरपेन, जिरानियाल, लिमोनिना,नेराल, टैनिंन, मेंजीफेरान,मेंजीफेराल
आदि तत्व पाए जाते हैं।
 

 ये आम के फूल या बौर है ये भी दवा के काम आती है।अगर आपको गले में कोई तकलीफ हो गयी हो ,या आवाज में मधुरता लानी है या कफ जनित कोई बीमारी है तो आम के ये सूखे हुए फूल बड़ा काम करते हैं .इन्हें मिश्री ,मुलेठी और आवले के साथ पीस कर काले अंगूर में मिक्स करके गोलियां बना लीजिये ,ब्रोंकाइटिस जैसी बीमारी भी ये दवा ख़त्म कर देगी।आवाज तो सुरीली होगी ही. 
 अगर मकडी ने काट लिया है तो अमचूर को पानी में मिला कर लेप कीजिए। 
आँतों में अन्दर ही अन्दर खून निकल रहा हो तो आम के पेड़ की छाल  का काढा बनाइये और 2 चम्मच  काढा आधा कप पानी में मिला कर 2-2 घंटे पर पीते रहिये।चार ही दिन में घाव ठीक होते देखा गया है।
खूनी बवासीर का तुरंत ईलाज करना हो तो आम के कोमल या नये पत्ते पानी में पीस कर चीनी मिला कर एक गिलास
 पानी में घोल कर पी जाएँ .कम से कम 21 दिन पीने से ये बीमारी जड़ से ही ख़त्म हो जायेगी 
ल्यूकोरिया में आप आम की छाल का काढा सुबह शाम 20-20 ग्राम एक कप पानी में मिला कर पीजिये ,एक महीने तक लगातार .
हिचकी बार बार आ रही हो तो आम के पत्तो का धुँआ  सुन्घिये।
कितनी ही तेज लू लग जाए और बुखार उलटी दस्त होने लगे हो तो सिर्फ आम ही आपको जिन्दगी वापस दे सकता है 
कच्चा आम छिलके समेत पानी में उबालिए फिर उसी पानी में हाथ से उस आम को मसल दीजिये और स्वाद के अनुसार नमक या चीनी मिला  
 कर पिला दीजिये ,सुबह दोपहर शाम एक एक गिलास बस। सारी बीमारी ख़त्म। 
कितना ही तकलीफदेह  दस्त आ रहा हो ,आप आम की गुठली के अन्दर   जो गिरी होती है उसकी चटनी पीस कर रोगी को बस आधा चम्मच    खिला दीजिये उसमें नमक या चीनी मिला सकते हैं  एक ही बार खिलाना काफी रहेगा वैसे सुबह शाम भी खिला सकते हैं. 
किसी को दाद खाज खुजली हो तो उस प्रभावित स्थान पर आम का चोप लगा दीजिये।इस काम को रोज एक बार कीजिए 21 दिनों तक। 
पके आम का रस पीने से शरीर सुन्दर और तेजस्वी बनता है .
पके आम का शरबत गले से डिप्थीरिया जैसी बीमारी को ख़त्म करता है। 
अगर गले में खराश हो गयी हो तो आम के पत्तो का काढा सुबह खाली पेट एक गिलास पी लीजिये ,एक गिलास काढ़े के लिए 10 पत्ते काफी हैं। 
नकसीर हो गयी है अर्थात नाक से खून निकल रहा है तो आम की गुठली तोड़ कर गिरी निकालिए और उसे पीस कर सुन्घिये।

देखा आपने कि  ये आम कितना ख़ास है।
इन आलेखों में पूर्व विद्वानों द्वारा बताये गये ज्ञान को समेट कर आपके समक्ष सरल भाषा में प्रस्तुत करने का छोटा सा प्रयत्न मात्र है .औषध प्रयोग से पूर्व किसी मान्यताप्राप्त हकीम या वैद्य से सलाह लेना आपके हित में उचित होगा

Monday 30 April 2012

कई सारे रोगों की दवा भी है पोदीना



  ये पोदीना है .इसे तो देखते ही ठंडक दिल में उतर जाती है .इसका वैज्ञानिक नाम है Mentha spicata .इसे मिंट भी कहते हैं.पोदीने की चटनी खानी हो या पुदीने का शरबत पीना हो बस जी मचल जाता है . इस पोदीने पर एक बड़ी प्रसिद्द कहावत भी है कि "अरे वो तो बावन बीघा पोदीना बोते हैं ". पहले शहरों में और अब तो सिर्फ गाँव में नल के पास ही जहां पानी एकत्र होता रहता था वहाँ पोदीने की एक डाल जमीन में गाड़ दी जाती थी और फिर उसे भूल जाते थे . वही एक डाल साल भर पूरे घर को ही नहीं मोहल्ले वालों को भी पोदीने की चटनी खिलाती थी .ये पौधा पानी या कीचड़ में ही फलता फूलता है.अब शहरों में तो आँगन होते ही नहीं और नल , वो  तो  आजकल की पीढी के बच्चे चलाना भी नहीं जानते होंगे. तो पोदीना बस बाज़ार में ही मिलता है. लेकिन ये पोदीना है बड़े काम की चीज ,कई सारे रोग आप इससे दूर भी कर सकते हैं.आइये आज अपनी जानकारियाँ मैं आपसे भी बाँट लूं-----
--सर दर्द  में आप पोदीना पीस कर माथे पर लेप कर लीजिये.
--जुकाम में पोदीने की पत्ती को हथेली में मसलिये और उसे बार बार सूंघिए.
--हिस्टीरिया का चक्कर आ रहा हो तो चार चम्मच पोदीने के रस को हल्का सा गरम करके ७ दिन तक पीते रहिये ,दिन में एक बार.
--किसी जहरीले कीड़े ने काट लिया हो तो २५ ग्राम पोदीने की चटनी में मिश्री मिला कर खिला दीजिये और काटे हुए स्थान पर पोदीना  पीस कर लेप कर दीजिये
--अगर मोटापा कम करना चाहते हैं तो जितनी बार भी चाय पीनी हो उसमे १० पत्तियां पोदीने की जरूर डाल लीजिये.आपको दो महीने में ही अंतर दिखाई देगा. अगर महिलाओं को मासिक धर्म में अनियमितता की शिकायत है तो इस चाय से वह भी दूर हो जायेगी. 
--चेहरे में या पैर के तलुओं में जलन हो रही है तो पोदीना पीस कर लेप कीजिए .चेहरे की जलन भी मिटेगी और सौन्दर्य भी बढेगा .
--गरमी में अगर जुकाम खांसी बुखार एक साथ हो जाए अर्थात लू लग जाए तो यही पोदीना नवजीवन देता है. २०-२५ पत्ते पोदीना के और ५-७ दाने काली मिर्च और सेंधा नमक मिलाकर एक गिलास पानी में उबालिए ,जब आधा पानी बचे तो छान लीजिये और थोड़ा ठंडा करके पी जाएँ , दिन में दो बार यह काम कीजिए .दो ही दिन में आप बिलकुल स्वस्थ महसूस करेंगे खुद को. 
 --दाद ,खाज ,खुजली या एक्जीमा हो तो २ चम्मच पोदीने की चटनी में आधा चम्मच नीबू का रस मिला कर रख लीजिये और प्रभावित स्थान पर रोज लगा कर सो जाएँ
--अगर पेट में कीड़े हो गये हैं तो २५ ग्राम पोदीना और १५ दाने काली मिर्च एक साथ पीसिए और एक गिलास पानी में इसे मिलाकर बिना चीनी नमक डाले पी जाइए ,५ दिन खाली पेट इसे पिए.
--अगर किसी को कैंसर हो गया है तो उसे रोज ५० ग्राम दही में २० ग्राम पोदीने की चटनी मिला कर खिलाइए .
--आँखों के नीचे काले घेरे हो गये हैं तो पोदीना पीस कर वहां लेप कर दीजिये ,आधे घंटे तक लगा रहने दीजिये फिर धो लीजिये.२१ दिनों तक इसे करके देखिये.
--आपका खूबसूरत चेहरा मुंहासों से खराब हो गया है तो पोदीने की शरण में जाए ,कुछ उसी तरह कि त्वमेव माता च पिता त्वमेव ,और पोदीने की चटनी पीसिये उसमे आधा नीबू काट कर निचोड़िए और अपने चेहरे पर लेप कर लीजिये ,२०-२१ दिनों में ही मुहांसे गायब .
-- आपको भूख न लग रही हो तो कच्चे आम और पोदीने की चटनी से रोटियाँ खाएं ,नमक जरूर मिलाएं .कुछ ही दिनों में भूख खुल के लगने लगेगी.
-- अगर मुंह से बदबू आ रही है तो पोदीने के काढ़े से गरारे कीजिए .
-- गला बैठ गया है या खराश हो गयी है या गला दर्द कर रहा है तो पोदीना का काढ़ा नमक मिलाकर बनाए और उससे गरारे कीजिए .१२ घंटे में ही आराम महसूस होगा.
--दांतों में दर्द हो तो पोदीने की पत्ती चबाये और मुंह में दर्द वाले दांत के पास रोके रखे  १५ मिनट में दर्द गायब
 यह पोदीने का फूल है ,इसी से पिपरमिंट बनता है, दुखने वाले दांत में आप पिपरमिंट भी लगा सकते हैं .
--गुदा द्वार में खुजली हो रही हो तो नारियल के तेल में पिपरमिंट मिलाकर लगा दीजिये ,यह रोग छोटे बच्चों को बहुत परेशान करता है और अक्सर बच्चे रोते भी रहते हैं.
-- नाक से खून गिर रहा हो तो दोनों नाक में पोदीने के रस की २-३ बूंदे डाल लीजिये.यह रोग गरमी में बहुत होता है जिसका कारण लू लगना भी होता है.
-- उलटी दस्त में तो पुदीन हरा राम बाण की तरह काम करता है .पुदीनहरा न हो तो पोदीना पीस कर भी पिलाया जा सकता है ,मीठा शरबत ज्यादा फायदा करेगा.
पोदीने में कैलोरी ,प्रोटीन, पोटेशियम, थायमिन, कैल्शियम, नियोसीन, रिबोफ्लेविन, आयरन, विटामिन-ए,बी ,सी डी और इ, मेन्थाल, टैनिन आदि रासायनिक घटक पाए जाते हैं.
अब बोयेंगे न आप भी बावन बीघा पोदीना............. 
 
 
इन आलेखों में पूर्व विद्वानों द्वारा बताये गये ज्ञान को समेट कर आपके समक्ष सरल भाषा में प्रस्तुत करने का छोटा सा प्रयत्न मात्र है .औषध प्रयोग से पूर्व किसी मान्यताप्राप्त हकीम या वैद्य से सलाह लेना आपके हित में उचित होगा

Tuesday 13 March 2012

कचनार




कचनार का फूल कितना खूबसूरत होता है ,देखते ही बस जी मचल जाता है .अरे ये है भी बहुत उपयोगी .अगर पूरा देश जान जाए की ये किस रोग की दवा है तो बस ये समझ लीजिये की बेचारा दुर्लभ फूल की श्रेणी में आ जाएगा . हो सकता है की तब सरकार को इसे प्रतिबंधित फूल घोषित करना पड़े.
कचनार का पेड़ ८ फीट तक उंचा हो जाता है.कही कहीं १५ से २० फीट की भी ऊँचाई देखी गयी है .थाईरायड और कुबड़ेपन का इलाज इस कचनार से किया जा सकता है.
इसके तने की छाल भी दवा के काम आती है ,इसमें शर्करा और टैनिन्स की बहुत मात्रा पायी जाती है.साथ ही मिर्सीताल और ग्लाइकोसाइड भी मौजूद है. इसकी छाल के काढ़े में बावची के तेल की २०-२५ बूंदे मिलाकर रोज पीने से बहुत पुराना कोढ़ भी ख़त्म हो जाता है. अगर कुबडापन हो तो बच्चे को इसकी छाल के काढ़े में प्रवाल भस्म मिला कर पिलानी चाहिए.पीले कचनार के पेड़  की छाल का काढा आंतो के कीड़े को मार देता है.मुंह के छाले किसी दवा से ठीक न हो रहे हों तो कचनार की छाल के काढ़े से गरारे और कुल्ला कीजिए ,फिर देखिये चमत्कार. 
कचनार के फूल थाईरायड की सबसे अच्छी दवा हैं. इसके फूल में हेन्त्रीआक्टें, बीटा- सितोस्टीराल, ओक्ताकोसनाल, स्तिग्मास्तीराल ,फ्लेवोनाइड आदि पाए जाते हैं.
आपको हाइपो हो या हाइपर थाईराइड कचनार के तीन फूलों की सब्जी या पकौड़ी बनाकर सुबह शाम खाएं.२ माह बाद टेस्ट कराएँ.
गले  में  गांठे  हो  गयी  हों  तो  कचनार  की  छाल को चावल के धोवन में पीसिये उसमे आधा चम्मच सौंफ का पावडर मिलाकर खा लीजिये ,एक महीने तक खाएं. 
खूनी बवासीर में कचनार की कलियों के पावडर को मक्खन और शक्कर मिलकर खाएं ,११ दिन लगातार.
आँतों में कीड़े होंतो कचनार की छाल का काढा पियें.१०-११  दिनों तक.
खूनी आंव हो रहे हों तो कचनार का एक एक फूल सुबह दोपहर शाम चबाएं,३ दिनों तक
आपका पेट निकल रहा हो तो आधा चम्मच अजवाइन को कचनार की जड़ के काढ़े से निगल लीजिये.१०-११ दिनों तक.
लीवर में कोई तकलीफ हो तो कचनार की जड़ का काढ़ा पीयें
गले की कोई भी ग्रंथि  बढ़ जाने पर कचनार के फूल या छाल का चूर्ण चावलों के धोवन में पीस कर उसमे सोंठ मिलकर लेप भी किया जा सकता है और पिया भी जा सकता है.
कचनार की टहनियों की राख से मंजन करेंगे तो दांतों में दर्द कभी नहीं होगा ,अगर हो रहा होगा तो ख़त्म हो जायेगा.
खून शुद्ध करने के लिए कचनार की कलियों का काढा पी सकते हैं.
रक्त प्रदर में इसकी कलियों के काढ़े में शहद मिलाकर पीजिये.
वैसे अगर आपके घर में कचनार का पेड़ हो तो आप इसकी कलियों का गुलकंद बनाकर रख लीजियेगा. बड़ा काम आता है ,बिना रोग के खाने में भी बहुत मजेदार होता है.








इन आलेखों में पूर्व विद्वानों द्वारा बताये गये ज्ञान को समेट कर आपके समक्ष सरल भाषा में प्रस्तुत करने का छोटा सा प्रयत्न मात्र है .औषध प्रयोग से पूर्व किसी मान्यताप्राप्त हकीम या वैद्य से सलाह लेना आपके हित में उचित होगा

Friday 2 March 2012

alka sarwat mishra



इन आलेखों में पूर्व विद्वानों द्वारा बताये गये ज्ञान को समेट कर आपके समक्ष सरल भाषा में प्रस्तुत करने का छोटा सा प्रयत्न मात्र है .औषध प्रयोग से पूर्व किसी मान्यताप्राप्त हकीम या वैद्य से सलाह लेना आपके हित में उचित होगा

Saturday 25 February 2012

ये भी सुन लीजिये


http://www.youtube.com/watch?v=j4R2LS7dXAs

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Thursday 23 February 2012

अद्भुत ताकत का खजाना

एक कहावत तो सदियों से मशहूर है कि-


हरण  ,बहेड़ा,आंवला घी शक्कर संग खाय
हाथी दाबे कांख में चार कोस ले जाय


आज कल इस ताकत की  तो कल्पना भी नहीं की जा सकती ,५ किलो सामान हाथ में लेकर आधा किलो मीटर पैदल चलना पड़े तो दांतों तले पसीना आ जाता है.
चलिए इस कहावत का ही आँख बंद करके अनुसरण किया जाए. कारण कि सर्दियां जाने वाली हैं ,गर्मियों में च्यवनप्राश खाया जाता नहीं. आइये अब हम इसी का च्यवनप्राश बना डालें ताकि कुछ ताकत तो आये. अगर हाथी दाबे वाली ताकत आ गयी तो बल्ले बल्ले .
वैसे तो हरण, बहेड़ा और आवला बाज़ार में त्रिफला के नाम से उपलब्ध है ,लेकिन हम खुद ही बना लें तो....
चलिये१०० ग्राम हरण ,२०० ग्राम बहेड़ा  और ३०० ग्राम आंवला  . अब इसमें ६०० ग्राम ताड़ मिश्री और १००० ग्राम देशी घी मिलाकर पेस्ट बनाकर कांच के मर्तबान में रख कर बंद कर दीजिये और ३ दिन उस मर्तबान को धूप में रख दीजिये .फिर ये खाने के लिए तैयार है ,प्रतिदिन कम से कम १० ग्राम तो खाना ही है वह भी खाली पेट.
खा करके मुझे बताइयेगा कि हाथी दाबे वाली ताकत आई कि नहीं. 


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Thursday 9 February 2012

वीर्यवान भव :

वीर्यवान भव : यही आशीर्वाद प्राचीन काल में बच्चों को दिया जाता था. यह सर्वश्रेष्ठ आशीर्वाद माना जाता था. इसके बाद नंबर आता था- पुत्रवान भव , तेजस्वी भव, विद्वान भव, बुद्धिमान भव का. आज कल तो नमस्ते ,सलाम, गुड मार्निंग का दौर है. अब कहाँ मिलते हैं आशीर्वाद.
आइये आज इस एक आशीर्वाद वीर्यवान भव के आयुर्वेदिक महत्व को खंगालते हैं.
वीर्य ही शक्ति का भण्डार है . शरीर में जहाँ वीर्य का निर्माण होता है ,आध्यात्मिक क्षेत्र के जानकार ठीक वहीं  कुंडलिनी शक्ति का सोयी हुई हालत में रहना बताते हैं. कुंडलिनी को जगाना ही सबसे दुष्कर कार्य है ,बड़ी बड़ी कठोर तपस्याए भी इस काम को नहीं कर पाती . आचार्य रजनीश ने उस क्षेत्र को जागृत रखने के लिए सम्भोग से समाधि की ओर का नारा दिया, लेकिन तथाकथित विद्वानों ने इसकी बड़ी आलोचना की .
आयुर्वेद कहता है कि  जब शरीर में वीर्य का निर्माण होगा ही नहीं तो शरीर के बाक़ी विकास कार्य भी अवरुद्ध हो जायेंगे. न भुजाओं में ताकत होगी , न खून बनेगा ,न ही बुद्धि काम करेगी ,न ही पाचन क्रिया सही होगी. अर्थात वीर्य नहीं तो शरीर मुर्दे के सामान है. अतः वीर्य का निर्माण सतत जारी रहना चाहिए .
हालांकि आयुर्वेद की ८०% जड़ी बूटियाँ जो भिन्न भिन्न रोगों की दवाओं का निर्माण करती है ,रोग को दूर करने के साथ ही साथ वीर्य का भी निर्माण करती हैं. इसलिए किसी भी रोग का इलाज आयुर्वेदिक पद्दति से करने का मतलब है -- आम के आम ,गुठलियों के भी दाम.     
वीर्य  को आप आधुनिक भाषा में क्रोमोसोम कह सकते हैं .वैज्ञानिको ने ये बता दिया है कि इन्हीं क्रोमोसोम पर रंग रूप,लम्बाई ,मोटाई ,दिमाग ,आँख ,नाक ,बीमारिया आदि को कंट्रोल करने वाले जीन मौजूद रहते हैं.ये क्रोमोसोम अर्थात गुणसूत्र ही जीवन का आधार माने गये हैं.अतः इनकी प्रचुरता शरीर में बहुत जरूरी है.आज आपको एक ख़ास चीज़ के बारे में बताती हूँ जो ये काम सुगमतापूर्वक करती है. हालांकि हम सभी उस चीज़ को जानते हैं.------
          ये है बबूल का गोंद अर्थात खाने वाला गोंद .अक्सर इसका प्रयोग प्रसूताओं के लिए होता है ,लेकिन ये गोंद नारी और पुरुष दोनों के ही प्रजनन अंगों को शक्ति पदान करने और उन्हें वीर्य से समृद्ध बनाने का काम करता है.



इस गोंद को अगर आप पानी में भिगो कर रख दीजिये और लगभग १ घंटे बाद उस पानी को छान कर पी लीजिये तो ये आपके शरीर में शक्ति और स्फूर्ति दोनों ही प्रदान करेगा. १२ घंटे में गोंद पूरी तरह पानी में नहीं घुलता ,जितना घुल गया है उतना छान कर पी लीजिये फिर उस बरतन में और पानी डाल दीजिये .गोंद का पानी अक्टूबर से लेकर मार्च तक पिया  जा सकता है .इसे १० वर्ष के ऊपर किसी भी लड़के लड़की को दिया जा सकता है.ये नुस्खा आपको ठंड से भी बचाएगा और शरीर के विकास में भी सहायक होगा .दिन में एक बार पीना काफी रहता है. 
अगर कोई मरीज अस्पताल से तुरंत डिस्चार्ज होकर लौटा है तो ये नुस्खा उसकी शक्ति लौटाने में बहुत कामयाब है.
गोंद को घी में भूनते हैं तो ये फूल कर बड़ा हो जाता है फिर उसका चूरा  करके मेवों के साथ मिला कर लड्डू बनाए जाते हैं . यह भी इसे खाने का एक तरीका है ,यह अक्सर प्रसूताओं के लिए बनाया जाता है ,किन्तु इसे कोई भी खा सकता है .
बबूल के गोंद में- गैलेक्टोज, एरेबिक एसिड, कैल्शियम तथा   मैग्नीशियम   के लवण उपस्थित होते हैं.
आयुर्वेद कहता है कि मुंख के छालों में, गले के सूखने में, मूत्र के अवरोध में, अतिसार और मधुमेह में इसका प्रयोग फायदा देता है.   






इन आलेखों में पूर्व विद्वानों द्वारा बताये गये ज्ञान को समेट कर आपके समक्ष सरल भाषा में प्रस्तुत करने का छोटा सा प्रयत्न मात्र है .औषध प्रयोग से पूर्व किसी मान्यताप्राप्त हकीम या वैद्य से सलाह लेना आपके हित में उचित होगा

Monday 23 January 2012

बेहद कमजोरी आ जाये तो


बहुत सारी बीमारियाँ ऎसी होती हैं कि  वो जब छोडती हैं तो जैसे लगता है कि शरीर में जान ही नहीं बची, और ऊपर से सितम ये कि कुछ खाने-पीने की इच्छा भी नहीं होती. फिर कोई हमदर्दी में  ताकत के लिए दवा -सिरप का नाम लेता है तो उससे बड़ा दुश्मन कोई लगता ही नहीं. खाने की भी हिम्मत नहीं होती या यू कहिये कि खाने-पीने की चीजें स्वादविहीन   लगने लगती हैं. ऎसी दशा में सबसे अच्छी चीज है शहद . 

**अगर मरीज बहुत कमजोर हो तो हर दो घंटे पर एक बड़ा चम्मच शहद पिला दीजिये .
**किसी को कैंसर या श्वास की बिमारी हुई हो तो सुबह दोपहर शाम एक-एक चम्मच शहद पी लिया करें.       
**जिस मरीज को ग्लूकोज चढ़ाना बहुत ज़रूरी हो लेकिन किन्ही कारणों से ग्लूकोज चढ़ाना उचित न हो तो फ़ौरन शहद का सहारा लीजिये 
** जिन नवजात शिशुओं की माता को दूध न उतर रहा हो उन बच्चों को शहद चटाना शुरू कीजिए ,शहद सम्पूर्ण आहार है.
** हिमोग्लोविन कम हो गया हो तो हर ३ घंटे पर एक चम्मच शहद दे दीजिये ,५ दिन में ही खून बढ़ जाएगा.
** बुजुर्गों के लिए तो शहद का सेवन रोज ही जरुरी है.पर दिन में बस दो बार.




इन आलेखों में पूर्व विद्वानों द्वारा बताये गये ज्ञान को समेट कर आपके समक्ष सरल भाषा में प्रस्तुत करने का छोटा सा प्रयत्न मात्र है .औषध प्रयोग से पूर्व किसी मान्यताप्राप्त हकीम या वैद्य से सलाह लेना आपके हित में उचित होगा

Saturday 17 December 2011

सर्दी की तकलीफ और हरसिंगार

 


कितने खूबसूरत होते हैं हरसिंगार के फूल और कितने काम की इसकी पत्तियाँ
कभी आपने १५-२० वर्ष पहले पराक्सीन नाम की अंग्रेजी दवा खायी थी ? इसके पावडर का स्वाद और हरसिंगार की पत्तियों का स्वाद एक ही जैसा होता है. जब बुखार बहुत पुराना हो जाता था और किसी दवा से ख़त्म नहीं होता था तो उस समय पराक्सीन दिया जाता था.हरसिंगार का पेड़ आप सभी का जाना पहचाना पेड़ है,कितने लोग तो हरसिंगार की खुशबू के दीवाने होते हैं. आइये आज उसी हरसिगार का हम पोस्टमार्टम कर डालें. 


इसे अंग्रेजी में Night Jasmine कहते हैं ,संस्कृत में- शेफालिका या पारिजातक भी कहते हैं.
इसके पत्तों, बीज   और तने में- निक्तैथिक एसिड, बीटा, इरिडोइड, लिग्नोसेत्रिक , मियरिस्तिक एसिड, ओलिक एसिक,  पामिटिक एसिड, स्तीयरिक एसिड, लिनोसेत्रिक, सितोस्तीराल, ग्लाइकोसाइद्स आर बोर ट्रिस्तोसाइड्स A, B, C, D ,E ग्लूकोमनान , एअस्त्रोग्लैनिन ,निक्तोफलोरीन, एस्कोर्बिक एसिड, कैरीतीन, टैनिन, फ्रक्टोज , ग्लूकोज, मैनीटाल, निक्तैन्थोसाइड, आरबोर साइड्स जैसे तत्व पाए जाते हैं.
इस पौधे के तने की छाल ,पत्ते, फूल और   बीजों का दवाओं के रूप में प्रयोग होता है. 
    


यह मूत्रल भी है, पसीना भी पैदा करता है, लीवर को भी उत्तेजित करता है, पेट साफ़ करता है, उत्तेजना पैदा करता है, बुखार ख़त्म करता है ,दर्द का तो दुश्मन है हरसिंगार.
अगर आपको कोई रोग न हो तब भी ठंड के दिनों में सप्ताह में एक बार हरसिंगार के पत्तों का काढा बना कर पी लीजिये. यह काढा शरीर में पनप रहे किसी भी रोग के कीटाणुओं को ख़त्म कर देता है.
सर में रूसी हो गयी हो तो हरसिंगार के बीज पीस कर पानी में मिलाइए और इसी पानी से बाल धो लीजिये .हफ्ते में तीन बार ही काफी रहेगा ,रूसी जड़ से ख़त्म.
सियाटिका के मरीजों को तो सप्ताह में तीन बार हरसिंगार की पत्तियाँ खूब अच्छी तरह उबाल कर अर्थात काढा बनाकर जरूर पीना चाहिए क्योंकि जाड़े में यह सियाटिका बहुत परेशान करता है.
हरसिंगार के बीज सर पर बाल भी पैदा कर देते हैं ,आप इन्हें  पानी के साथ पीस कर चटनी बनाएं और सर में गंजेपन वाले स्थान पर लगा लीजिये.लगातार २१ दिन प्रयोग कीजिए.
पेट में केचुए या कीड़े हो तो पत्ते पीस कर उसका रस निचोड़िए और एक चम्मच रस में आधा चम्मच शहद मिला कर चाट लीजिये ,सुबह दोपहर शाम , दिन में तीन बार.तीन दिनों में ही सारे कीड़े मर जायेंगे.
खांसी न रुक रही हो और दमे में परिवर्तित हो गयी हो तो हरसिंगार के तने की छाल का पावडर लगभग चार चुटकी भर लीजिये और पान के पत्ते में रखकर मरीज को दिन में चार  बार चूसने को दीजिये.
शरीर में कहीं दर्द हो रहा हो तो या तो इसके पत्तों का काढा पीजिये या फिर पत्तो को पीस कर रस निकालिए और बराबर मात्रा में अदरक का रस उसमे मिलाइए और पी लीजिये. दोनों का रस २-२ चम्मच हो तो अच्छा है.
मलेरिया का बुखार हो तो २ चम्मच हरसिंगार के पत्ते का रस , दो चम्मच अदरक का रस और दो चम्मच शहद मिला कर दिन में २ बार पिला दीजिये.
घुटनों के दर्द से परेशान रहने वालो और सियाटिका के मरीजो के लिए तो ठंड के मौसम में हरसिंगार वरदान है.
  
इन आलेखों में पूर्व विद्वानों द्वारा बताये गये ज्ञान को समेट कर आपके समक्ष सरल भाषा में प्रस्तुत करने का छोटा सा प्रयत्न मात्र है .औषध प्रयोग से पूर्व किसी मान्यताप्राप्त हकीम या वैद्य से सलाह लेना आपके हित में उचित होगा

Friday 2 December 2011

कलौंजी के फायदे




कलौंजी का पौधा सौंफ के पौधे की तरह होता है इसके फूल हलके नीले रंग के होते हैं.कलौंजी के दाने तिकोने और काले रंग के होते हैं.ये बहुत सुगन्धित भी होते हैं.ये बहुत ताकतवर होते हैं.
कलौंजी के बीजों में मैलेंथीन,मैलेंथेजैनिंन ,एल्ब्यूमीन, शर्करा, गोंद, टैनिन, ग्लूकोसाइड, राल, स्थिर तेल, उड़नशील तेल जैसे तत्व विराजमान हैं.



इसे हिन्दी में मंगरैल ,फारसी में स्याह्दाना, अरबी में- हब्बतुस्सोदा, बंगाली में काली जीर, गुजराती मराठी आदि अनेक भाषाओं में कलौंजी ,संस्कृत में स्थूल्जीरक, बहुगंधा, अंग्रेजी में- Black curmin तथा  वैज्ञानिक  भाषा  में Nigella sativa कहते  हैं.


** अपच या पेट दर्द में आप कलौंजी का काढा बनाइये फिर उसमे काला नमक मिलाकर सुबह शाम पीजिये.दो दिन में ही आराम देखिये.
** मसाने और गुर्दे में पथरी हो तो कलौंजी को पीस कर पानी में मिलाइए फिर उसमे शहद मिलाकर पीजिये ,१०-११ दिन प्रयोग करके टेस्ट करा लीजिये.कम न हुई हो तो फिर १०-११ दिन पीजिये.
** कलौंजी की राख को तेल में मिलाकर गंजे अपने सर पर मालिश करें कुछ दिनों में नए बाल पैदा होने लगेंगे.इस प्रयोग में धैर्य महत्वपूर्ण है.
** अगर गर्भवती के पेट में बच्चा मर गया है तो उसे कलौंजी उबाल कर पिला दीजिये ,बच्चा निकल जायेगा.और गर्भाशय भी साफ़ हो जाएगा.
** किसी को बार-बार हिचकी आ रही हो तो कलौंजी के चुटकी भर पावडर को ज़रा से शहद में मिलकर चटा दीजिये.  
** अगर किसी को पागल कुत्ते ने काट लिया हो तो आधा चम्मच से थोडा  कम बल्कि तीन  ग्राम कलौंजी को पानी में पीस कर पिला दीजिये.बस ३-४ बार एक दिन में एक ही बार
** जुकाम परेशान कर रहा हो तो इसके बीजों को गरम कीजिए ,मलमल के कपडे में बांधिए और सूघते रहिये. दो दिन में ही जुकाम और सर दर्द दोनों गायब .
** कलौंजी की राख को पानी से निगलने से बवासीर में बहुत लाभ होता है.
** कलौंजी का उपयोग चरम रोग की दवा बनाने में भी होता है.
** कलौंजी को पीस कर सिरके में मिलकर पेस्ट बनाए और मस्सों पर लगा लीजिये.मस्से कट जायेंगे.
** मुंहासे दूर करने के लिए कलौंजी और सिरके का पेस्ट रात में मुंह पर लगा कर सो जाएँ.
** कलौंजी का पावडर शहद में मिला कर काटे हुए स्थान पर  लगाने से बंदर का जहर ख़त्म हो जाएगा 
** जब सर्दी के मौसम में सर दर्द सताए तो कलौंजी और जीरे की चटनी पीसिये और मस्तक पर लेप कर लीजिये.
** घर में कुछ ज्यादा ही कीड़े-मकोड़े निकल रहे हों तो कलौंजी के बीजों का धुँआ कर दीजिये.




इन आलेखों में पूर्व विद्वानों द्वारा बताये गये ज्ञान को समेट कर आपके समक्ष सरल भाषा में प्रस्तुत करने का छोटा सा प्रयत्न मात्र है .औषध प्रयोग से पूर्व किसी मान्यताप्राप्त हकीम या वैद्य से सलाह लेना आपके हित में उचित होगा

Tuesday 29 November 2011

जायफल के गुण


ये जायफल का पेड़ है
इसके पत्ते हरे -पीले रंग के अंडाकार और चिकने होते हैं.फूल सफ़ेद रंग के घंटियों के आकार के होते हैं. जायफल का पेड़ सुन्दर और विशाल होता है. जायफल का रासायनिक संग्थ्हन बहुत टिपिकल है- इसके फल में जिरानियाल, यूजीनोल, सैफ्रोल, आइसोयूजिनोल, फैटिक एसिड, लोरिक एसिड, आलिक एसिड, लिनोलिल एसिड, स्टीयारिक एसिड, मियारीस्टिक एसिड,मिरीस्टिक एसिड, पामिटिक एसिड, उड़नशील तेल,स्थिर तेल आदि तत्व पाए जाते हैं.इसी कारण जायफल का एक ग्राम चूर्ण बड़ी तेज काम करता है.
यह एक जायफल अनेक बीमारियों की दवा है-
** सर में बहुत तेज दर्द हो रहा हो तो बस जायफल को पानी में घिस कर लगाएं.
** सर्दी के मौसम के दुष्प्रभाव से बचने के लिए जायफल को थोड़ा सा खुरचिये, चुटकी भर कतरन हो जाए तो उसे मुंह में रखकर चूसते रहिये.यह काम आप पूरे जाड़े भर एक या दो दिन के अंतराल पर करते रहिये.

** आपको किन्हीं कारणों से भूख न लग रही हो तो चुटकी भर जायफल की कतरन चूसिये इससे पाचक रसों की वृद्धि होगी और भूख बढ़ेगी ,भोजन भी अच्छे तरीके से पचेगा.
** दस्त आ रहे हों या पेट दर्द कर रहा हो तो जायफल को भून लीजिये और उसके चार हिस्से कर लीजिये एक हिस्सा मरीज को चूस कर खाने को कह दीजिये .सुबह शाम एक-एक हिस्सा खिलाएं.
** फालिज का प्रकोप जिन अंगों पर हो उन अंगों पर जायफल को पानी में घिस कर रोज लेप करना चाहिए ,दो माह तक ऐसा करने से अंगों में जान आ जाने की ८० % संभावना देखी गयी है.
** प्रसव के बाद अगर कमर दर्द नहीं ख़त्म हो रहा है तो जायफल पानी में घिस कर कमर पे सुबह शाम लगाएं ,एक सप्ताह में ही दर्द गायब हो जाएगा.
** पैरों में जाड़े में बिवाई खूब फटती है, ऐसे समय ये जायफल बड़ा काम आता है ,इसे  महीन पीस कर बीवाइयों में भर दीजिये.१२-१५ दिन में ही पैर भर जायेंगे.
** जायफल के चूर्ण को शहद के साथ खाने से ह्रदय मज़बूत होता है. पेट भी ठीक रहता है.
** अगर कान के पीछे कुछ ऎसी गांठ बन गयी हो जो छूने पर दर्द करती हो तो जायफल को पीस कर वहां लेप कीजिए जब तक गाठ ख़त्म न हो जाए, करते रहिये.
** अगर हैजे के रोगी को बार-बार प्यास लग रही है तो जायफल को पानी में घिस कर उसे पिला दीजिये.
** जी मिचलाने की बीमारी भी जायफल   को थोड़ा सा घिस कर पानी में मिला कर पीने से नष्ट हो जाती है.
** इसे थोडा सा घिस कर काजल की तरह आँख में लगाने से आँखों की ज्योति बढ़ जाती है.और आँख की खुजली और धुंधलापन ख़त्म हो जाता है.
** यह शरीर की स्वाभाविक गरमी की रक्षा करता है ,इसलिए ठंड के मौसम में इसे जरूर प्रयोग करना चाहिए.
** यह कामेन्द्रिय की शक्ति भी बढाता है.
** जायफल आवाज में सम्मोहन भी पैदा करता है.
** जायफल और काली मिर्च और लाल चन्दन को बराबर मात्रा में लेकर पीसकर चेहरे पर लगाने से चेहरे की चमक बढ़ती है,मुहांसे ख़त्म होते हैं.
** किसी को अगर बार-बार पेशाब जाना पड़ता है तो उसे जायफल और सफ़ेद मूसली २-२ ग्राम की मात्र में मिलाकर पानी से निगलवा दीजिये ,दिन में एक बार ,खाली पेट, १० दिन लगातार.
** बच्चों को सर्दी-जुकाम हो जाए तो जायफल का चूर्ण और सोंठ का चूर्ण बराबर मात्रा में लीजिये फिर ३ चुटकी इस मिश्रण को गाय के घी में मिलाकर बच्चे को कहता दीजिये. सुबह शाम चटायें. 


जायफल के नाम 
इसे भिन्न -भिन्न भाषाओं में भिन्न-भिन्न नामों से पुकारा जाता है.- बंगाली और गुजराती में जायफल , कन्नड़ और तेलगू में-जजिकाया,जादिफल, तमिल में- आदि परभम, कोसम, सालुगमे, सीलों में-सादिकई ,कन्नर में जाजी, फारसी में- जोजबोय, अरबी में- जोजउल्तिब, जवावा, संस्कृत में- जातिफल, जातिशा, सगा,कोशा, मधुशोंदा, माल्तीफला, राज्बोग्या, शालुका और वैज्ञानिक भाषा में-Myristica fragrans 




    इन आलेखों में पूर्व विद्वानों द्वारा बताये गये ज्ञान को समेट कर आपके समक्ष सरल भाषा में प्रस्तुत करने का छोटा सा प्रयत्न मात्र है .औषध प्रयोग से पूर्व किसी मान्यताप्राप्त हकीम या वैद्य से सलाह लेना आपके हित में उचित होगा

Sunday 13 November 2011

निर्गुन्डी: स्लिप डिस्क और सर्वाइकल बीमारियों की दुश्मन






निर्गुन्डी (Vitex negundo)शेफाली,सम्मालू, सिंदुवार आदि नाम से भी जानी -पहचानी जाती है. इसके पेड़ १० फीट तक ऊंचे पाए जाते हैं. इसे संस्कृत में इन्द्राणी, नीलपुष्पा, श्वेत सुरसा,सुबाहा कहते हैं.बंगाली में निशिन्दा, सेमालू, मराठी में- कटारी, लिगुर, शिवारी पंजाबी में- बनकाहू, मरवा, बिन्ना, मावा, मोरों, खारा, सनक फारसी में- बजानगश्त, सिस्बन, गुजराती में-नगोड़, नागोरम, निर्गारा,तेलगू में- नल्लाहा बिली,मिन्दुवरम तमिल में-निकुंडी, नोची कहा जाता है.


निर्गुंडी में उड़नशील तेल,विटामिन-सी, केरोटीन, फलेवोन, टैनिक एसिड, निर्गुन्दीन, हाइड्रोकोटिलोन, हाइड्रोक्सीबेन्जोईक एसिड, मैलिक एसिड और राल पाए जाते हैं.
  



**निर्गुंडी अनेक बीमारियों में काम आती है. सबसे बड़ी बात क़ि स्लीप डिस्क की ये एकलौती दवा है. सर्वाइकल, मस्कुलर पेन में इसके पत्तो का काढा रामबाण की तरह काम करता है.
** अस्थमा मे इसकी जड़ और अश्वगंधा की  जड़ का काढा ३ माह तक पीना चाहिए.
**गले के अन्दर सूजन हो गयी हो तो निर्गुंडी के पत्ते, छोटी पीपर और चन्दन का काढा पीजिये, ११ दिनों में सूजन ख़त्म हो जायेगी.
**सूतिका ज्वर में निर्गुंडी का काढा  देने से गर्भाशय का संकोचन होता है और भीतर की सारी गंदगी बाहर निकल जाती है. गर्भाशय के अंदरूनी भाग की सूजन ख़त्म हो जाती है और वह पूर्व स्थिति में आ जाता है ,जिससे प्रसूता को बुखार से मुक्ति मिल जाती है और दर्द ख़त्म हो जाता है. बच्चा जानने के बाद निर्गुंडी के पत्तो का काढा हर महिला को दिया जाना चाहिए और एबार्शन के बाद भी यह कादा जरूर पिलाना चाहिए क्योंकि गर्भ में अगर कोई भी मांस का टुकड़ा छूट जाएगा तो वह बाद में यूट्रस कैंसर का कारण बनेगा.
पेट में गैस बन रही है तो निर्गुंडी के पत्तो के साथ काली मिर्च और अजवाइन का चूर्ण खाना चाहिए ताकि गैस बननी बंद हो और पेट का दर्द ख़त्म हो और पाचन क्रिया सही हो जाए.
 
**भंगरैया तुलसी और निर्गुंडी के पत्तो का रस अजवाईन का चूर्ण मिलाकर पीने से गठिया की सूजन और  दर्द में बहुत लाभ होता है.
**कामशक्ति बढाने के लिए निर्गुन्डी और सोंठ का चूर्ण दूध के साथ लेना चाहिए.
**निर्गुंडी सर्दी जनित रोगों में बहुत फायदा करती है .
** निर्गुंडी के काढ़े से रोगी के शरीर को धोने पर सभी तरह की बदबू, दुर्गन्ध  ख़त्म हो जाती है.
**भैषज्य रत्नावली के अनुसार निर्गुंडी  रसायन शरीर का कायाकल्प करने में सक्षम है यह लम्बे समय तक मनुष्य को जवान बनाए रखता है , इसे बनने में पूरे एक माह लगते हैं,इसे किसी अनुभवी वैद्य से ही बनवाना चाहिए.
** निर्गुंडी के तेल से बालो का सफ़ेद होना ,बालो का गिरना , नाडी के घाव और खुजली जैसी बीमारियों में बहुत लाभ पहुंचता है किन्तु इसे भी किसी जानकार वैद्य से ही बनवाना उचित रहता है.
** अगर डिलीवरी पेन शुरू हो गया है और आप सरलता पूर्वक प्रसव कराना चाहते हैं तो निर्गुंडी के पत्तो की चटनी को महिला की नाभि के आस-पास लेप कर दीजिये.
** मुंह के छाले ख़त्म करने के लिए निर्गुंडी के पत्तो के रस में शहद मिलाकर उस मिश्रण को ३-४ मिनट मुंह में रखें फिर कुल्ला कर दीजिये.दो ही दिन में छाले ख़त्म हो जायेंगे.
** निर्गुंडी और शिलाजीत का मिश्रण   शरीर के लिए अमृत का काम करता है.
** निर्गुंडी और पुनर्नवा का काढा शरीर के सारे दर्द ख़त्म करता है.
** कमर को सही आकार में रखने के लिए निर्गुंडी के पत्तो के काढ़े में २ ग्राम पीपली का चूर्ण मिला कर एक महीने पीजिये.
** स्मरण शक्ति बढाने के लिए निर्गुंडी की जड़ का ३ ग्राम चूर्ण इतने ही देशी घी के साथ मिलाकर रोज चाटिये .
** साइटिका में निर्गुंडी के पत्तो क़ि चटनी को गरम करके सुबह शाम बांधना चाहिए या फिर इसका काढा पीना चाहिए.
** स्वास रोग में पत्तो का रस शहद मिलाकर दिन में चार बार एक  -एक चम्मच पीना चाहिए.
** निर्गुंडी के बीजों का चूर्ण दर्द निवारक औषधि है लेकिन हर दर्द में इसकी मात्रा अलग-अलग होती है.


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Friday 21 October 2011

सिघाड़ा ; गर्भवती महिलाओं के लिए अति उत्तम औषधि










कार्तिक का महीना है ,नए- नए सिघाड़े बाज़ार में आ गये हैं. खूब खाइए. शरीर को मैगनीज तत्व की भी जरूरत होती है. आप चाहे जितने टानिक पी लीजिये, ताकत की दवाएं खा लीजिये लेकिन जब तक शरीर में इन तत्वों को पूर्ण रूप से पचाने की क्षमता नहीं होगी ,दवाए कोई असर नहीं दिखाएंगी. अकेला सिघाड़ा एक ऐसा फल है जो शरीर में मैगनीज एब्जार्ब करने की क्षमता बढ़ा देता है. और बुढापे में होने वाली अधिकाश बीमारियाँ सिर्फ मैगनीज की कमी के कारण होती हैं.
जिन महिलाओं का गर्भकाल कभी पूरा न होता हो या गर्भ के दौरान गर्भ गिरने का डर लगा रहता हो उन्हें खूब ज्यादा सिघाड़े खाने चाहिए. ये भ्रूण  को तो मजबूती देता ही है ,गर्भवती महिला की भी रक्षा करता है. ये पुरुषों के लिए शुक्रवर्धक औषधि का काम करता है.
सिघाड़े में टैनिन, सिट्रिक एसिड, एमिलोज, एमिलोपैक्तीं, कर्बोहाईड्रेट, बीटा-एमिलेज, प्रोटीन, फैट, निकोटेनिक एसिड, फास्फोराइलेज, रीबोफ्लेविन, थायमाइन, विटामिन्स-ए, सी तथा मैगनीज आदि तत्व मौजूद हैं.
यह जल में पैदा होने वाला फल है, तिकोने पत्ते और सफ़ेद फूलों वाले इस पौधे में फल भी तिकोने ही लगते हैं. छोटे छोटे ताल-तलैयों में आपको इस मौसम में भी इसके पत्ते पानी में फैले हुए मिल जायेंगे.


__ सिघाड़े के तने का रस निकाल कर एक-एक बूंद आँख में डालने से किसी भी प्रकार की आँखों की बीमारी दूर हो जाती है.
__ जिस व्यक्ति को ज़रा सी खरोंच लग जाए और खून बहुत ज्यादा निकलता हो उसे तो खूब सिघाड़े खाने चाहिए  ताकि उसकी ये बीमारी दूर हो जाए. सिघाड़े  में रक्त स्तंभक का गुण भी पाया जाता है.
 __ गर्भवती महिलाओं को दूध के साथ सिघाड़ा खाना चाहिए, गर्भ के सातवें महीने में तो अनिवार्य रूप से इसका प्रयोग करना चाहिए.
__ पेशाब में रुकावट महसूस हो रही है तो सिघाड़े का काढा बनाकर दिन में दो बार ले लीजिये.
__ सिघाड़ा ल्यूकोरिया, दस्त, खून में खराबी जैसी बीमारियों को भी ठीक करता है.


हरा सिघाड़ा सूखे सिघाड़े की अपेक्षा ज्यादा फायदा करता है ,इसलिए इस मौसम में खूब सिघाड़ा खाएं या सब्जी बनाकर या उबाल कर या कच्चे ही. अमृत तो ये है ही.


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Friday 14 October 2011

मिर्च ; बड़े काम की चीज है



मिर्च , नाम  आते  ही  कुछ  लोग सी-सी करने लगते हैं तो कुछ लोग चटखारे लेने लगते हैं. हमारे देश में यही तो समस्या है की एक स्वाद के बारे में दो लोगों की राय कभी एक नहीं हो सकती. पर इसमें बेचारी मिर्च का क्या दोष . वह फायदा तो सभी को एक ही जैसा पहुँचाती है. मिर्च सिर्फ तीती या कडवी ही नहीं होती, बहुत सारे रोगों में तो ये किसी बहुत अच्छी मिठाई से भी ज्यादा मीठी होती है. आइये आज इसी को चख कर देख लेते हैं---

आपको पता है,    इसमें कितने सारे तत्व पाए जाते हैं-
अमीनो एसिड, एस्कार्बिक एसिड, फोलिक एसिड, सिट्रीक एसिड, ग्लीसरिक एसिड, मैलिक एसिड, मैलोनिक एसिड, सक्सीनिक एसिड, शिकिमिक एसिड, आक्जेलिक एसिड, क्युनिक एसिड, कैरोटीन्स , क्रिप्तोकैप्सीन, बाई-फ्लेवोनाईड्स, कैप्सेंथीन, कैप्सोरूबीन डाईएस्टर, आल्फा-एमिरिन, कोलेस्टराल, फ़ाय्तोईन, फायटोफ़्लू, कैप्सीडीना, कैप्सी-कोसीन, आल्फा-एमीरीन आदि.
इसमें जो फोलिक एसिड है वह ऐसा तत्व है जिसके कारण सफेदमूसली का महत्व बढ़ जाता है और यही तत्व गर्भवती महिलाओं को सिर्फ इसलिए दिया जाता है ताकि  बच्चे का खासकर बच्चे के प्रजनन अंगों का ठीक से विकास हो सके.

अगर आपको किसी कुत्ते ने काट लिया है तो अस्पताल भागने से पहले घर में अगर लालमिर्च हो तो उसकी चटनी पीस कर काटने वाले स्थान पर लगा लीजिये.यह इंजेक्शन का विकल्प है, यह चटनी लगाने के बाद फिर इंजेक्शन की जरूरत नहीं पड़ती. ये ऐसे लोगों के लिए लाभदायक है जिनके घर से अस्पताल का रास्ता एक घंटे से ज्यादा समय का हो.
खून में हीमोग्लोविन कम हो जाए तो प्रतिदिन कम से कम ६ हरी मिर्च खाएं, कच्ची ही .५-६ दिनों में हिमोग्लोविन सामान्य हो जाएगा. जिनके ब्लड में प्लेटलेट्स घट जाती हैं, उन्हें भी ये कच्ची हरी मिर्च बहुत फायदा पहुँचाती है.
बदन में दाद-खाज खुजली या किसी प्रकार का चर्म रोग हो जाए तो आप सरसों के तेल में लालमिर्च का पावडर खौलाइये, फिर इस तेल को ठंडा करके छान लीजिये और पूरे बदन पर या खुजली वाले स्थान पर रो लगा कर सो जाए .२१-२२ दिनों में सफ़ेद हो गयी त्वचा भी सामान्य रंग में आना शुरू कर देती है.
कालरा में एक चम्मच  मिर्च का पावडर एक चम्म्ह नमक के साथ पानी में उबालिए ,फिर उस पानी को चाय समझ के पी जाए. दिन में दो बार कीजिए ,जबरदस्त लाभ होता है.
पेट दर्द कर रहा हो तो हरी मिर्च या   लाल मिर्च के दो ग्राम बीज गुनगुने पानी से निगल लीजिये.

किसी ने ज्यादा शराब पी ली है और हैंगओवर हो गया है तो मिर्च का २ चुटकी पावडर गुनगुने पानी में मिला कर दिन में दो तीन बार पिला दीजिये.

सन्निपात के रोगी को अगर एक मिर्च पीस कर किसी तरह पिला दी जाए तो मूर्छा फ़ौरन ख़त्म हो जाती है.

जब जलवायु परिवर्तित होने लगे तो हरी मिर्च का सेवन ज्यादा कर देना चाहिए.

लेकिन लाल मिर्च के सेवन से हमेशा बचना चाहिए ,यह कई सारे रोग उत्पन्न कर देती है ,रोज लाल मिर्च खाने से लीवर कमजोर हो जाता है, अंडकोष, किडनी, आँखे भी कमजोर हो जाते हैं.पेट की पाचन शक्ति कम हो जाती है और कैंसर होने के रास्ते खुक्ल जाते हैं, इसलिए लालमिर्च का सिर्फ बाहरी उपयोग ही करना चाहिए ,इसे खाने से परहेज करना चाहिए. आयुर्वेद के अनुसार लालमिर्च का ज्यादा उपयोग या नियमित उपयोग संखिया के जहर का काम करने लगता है. ब्लड   भी अशुद्ध हो जाता है.

जबकि हरी मिर्च खाने से मुंह की लार अधिक उत्पन्न होती है जो भोजन को अच्छी तरह पचती तो है ही ,गैस नहीं बनने देती है और हृदय   को तथा प्रजनन शक्ति को ताकत प्रदान करती है. मल- मूत्र विसर्जन के रास्ते में आने वाली सारी बाधाएं दूर करती है.
  
   


इन आलेखों में पूर्व विद्वानों द्वारा बताये गये ज्ञान को समेट कर आपके समक्ष सरल भाषा में प्रस्तुत करने का छोटा सा प्रयत्न मात्र है .औषध प्रयोग से पूर्व किसी मान्यताप्राप्त हकीम या वैद्य से सलाह लेना आपके हित में उचित होगा